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Trip To Spiti Valley - Tabo To Kaza | स्पिति वैली यात्रा - ताबो से काज़ा

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स्पिति वैली यात्रा - 04 जून 2019 - ताबो से काज़ा


आज सुबह उठ कर अलग ही एहसास हो रहा था क्योंकि आज हम हमारी मंजिल पर, जो की काज़ा थी, पहुँचने वाले थे l इस मंजिल पर पहुँचने के लिए कब से हम सब तैयारियाँ कर रहे थे और आखिरकार आज वो दिन आ गया था l ताबो से काज़ा बमुश्किल 50 किलोमीटर ही है इसीलिए हम सब बहुत जल्दी में नहीं थे l ताबो में सुबह सुबह काफी तेज़ सर्द हवाएँ चल रही थी और हम सबने गर्म कपडे और टोपे पहन कर ही सुबह की सैर की l हमारे होटल के बिलकुल पास में ही मोनेस्ट्री थी इसीलिए हम सुबह सुबह वहाँ के क्रियाकलाप देखने चले गए l



नहा-धो कर और नाश्ता करने के बाद विक्रांत और मैं अपनी अपनी बाइक्स पर सामान बाँधने पहुँचे l जैसे ही मैंने मेरी बाइक पर सामान रखा मुझे लगा की मेरी बाइक का पीछे वाला टायर पंक्चर हो गया है l अच्छी तरह से देखा तो मेरा अनुमान सही था l मेरे टायर में हवा बिलकुल सही थी फिर भी टायर पंक्चर कैसे हो गया ? खैर इतनी बड़ी यात्राओं में ये सब तो होता ही रहता है l हालाँकि हमारे पास पंक्चर रिपेयर किट भी थी परन्तु शेवांग जी ने बताया की होटल से बमुश्किल सौ मीटर दूर ही एक पंक्चर वाला है l मन में ख़ुशी हुई की चलो वहाँ अच्छी तरह से पंक्चर निकलवा लेंगे l

मैं और रजत पंक्चर वाले तक बाइक ले कर गए l पंक्चर वाले ने पीछे वाले टायर में पंक्चर ढूंढा और लगा दिया l पंक्चर वाले ने बताया की मेरी बाइक के दोनों टायर बहुत ज्यादा अच्छी स्तिथि में नहीं है, ये सुन कर मुझे बड़ी उलझन सी महसूस हुई क्योंकि जयपुर में मैंने जब अपनी बाइक के टायर चेक करवाए थे तब वो बोल रहे थे की ये टायर तो अभी पाँच-छे हज़ार किलोमीटर से ज्यादा चल जाएँगे l मैंने पंक्चर वाले से दोनों टायर अच्छी तरह से चेक करने को बोला l देखा तो अगले टायर में भी एक जगह से टायर फुला हुआ था और वहाँ से ये काफी कमजोर लग रहा था l इसे देख कर मैं बहुत तनाव में आ गया लेकिन अब कुछ भी नहीं हो सकता था l नया टायर तो मिलने का सवाल ही नहीं था और अगर लेना भी होता तो उल्टा शिमला जाना पड़ता l दुःख की बात ये थी के इस टायर को अच्छी तरह से रिपेयर करने का सामान भी वहाँ उपलब्ध नहीं था इसीलिए मुझे इसी टायर से काज़ा तक तो जाना ही था l

समस्या ये थी की अब मैं बाइक तेज़ नहीं चला सकता था और अगले टायर का फुला वाला हिस्सा अगर किसी नुकीली चीज़ पर चढ़ गया तो मेरी यात्रा वहीँ पर ख़त्म हो सकती थी l मेरी लेह यात्रा के दौरान भी एक ऐसी ही स्तिथि पैदा हुई थी जब मेरी बाइक में कुलेंट की समस्या हुई थी और उस वक़्त भी मुझे मेरी यात्रा पूरी होने में संशय हुआ था l

पंक्चर निकलवा कर हम सब लगभग साढ़े-नौ बजे काज़ा के लिए रवाना हो गए l अब मैं बाइक बहुत सावधानी से चला रहा था और कोशिश कर रहा था की बाइक का अगला टायर सड़क के सबसे साफ़ हिस्से पर रखूं l अब मेरी सारी उम्मीद काज़ा से जुडी थी l ताबो से निकलने के बाद हम स्पिति नदी के किनारे किनारे चलने लगे l अधिकतर जगह पर सड़क काफी अच्छी स्तिथि में थी और ये मेरे लिए अच्छी बात थी l साफ़ नीले आकाश के नीचे स्पिति नदी में पानी मटमैला लग रहा था और आस पास का वातावरण भी भूरी आभा से युक्त था l

लगभग साढ़े दस बजे हम ताबो-काज़ा मार्ग छोड़कर धनकर गोम्पा की ओर निकल गए l धनकर गोम्पा लगभग 12,775 फीट की ऊँचाई पर स्तिथ है और ये काफी पुरानी मोनेस्ट्री है l इस किलेनुमा मोनेस्ट्री में ख़ास बात ये है की ये बहुत ऊँची चट्टान पर बनी हुई है l धनकर मोनेस्ट्री तक जाने वाली सड़क काफी अच्छी थी और जैसे जैसे हम ऊपर चढ़े वैसे वैसे आस पास के दृश्य शानदार होते गए l इस इलाके में स्पिति नदी बहुत बड़े भूभाग में बहती है परन्तु तुलनात्मक रूप से पानी कम होने के कारण नदी में बहुत सारी छोटी छोटी धारायें दिखाई देती है जो की अलग ही दृश्य पैदा करती है l

धनकर मोनेस्ट्री जिस पहाड़ की चट्टानों पर बनी हुई है वो चट्टानें आस पास की चट्टानों से काफी अलग सी दिखाई देती है और इसके पीछे दूर दिखने वाला पहाड़ तो वाकई बड़ा अजीब दिखता है l इस दूर दिखे रहे पहाड़ में बहुत सारी परतें दिखाई देती है और ये प्राकृतिक कम और तराशा हुआ ज्यादा दिखता है l वास्तव में, कई बार प्रकृति आपको हैरान कर देती है l

ग्यारह बजे के आस पास मैं और विक्रांत मोनेस्ट्री पहुँच गए l रजत, राजेश और अश्वनी काफी देर बाद आये क्योंकि वो लोग मोनेस्ट्री से पहले ही एक बुद्धिश मंदिर में रुक गए थे l बहुत सारे लोग इस बुद्धिश मंदिर को ही मोनेस्ट्री समझने की गलती कर रहे थे l हम सब ने धनकर मोनेस्ट्री काफी देर तक देखी और हम सब इसकी छत पर भी गए जो की एक तरह से बिलकुल कच्ची ही थी और बस कुछ लकड़ी के फट्टों पर ही टिकी हुई थी लेकिन वहाँ से दिखने वाले दृश्य बेहद लाजवाब थे और हम सबने वहाँ से काफी फ़ोटोज़ ली l यहीं पर एक फोटो खिचवाने के दौरान विक्रांत ने अपने पैरों के नी-गार्ड खोल कर रख दिए और आते वक़्त हम उन्हें उठाना भूल गए l मोनेस्ट्री ने नीचे आकर हम सबने चाय-काफी ली और फिर काज़ा की ओर रवाना हो गए l

शिच्लिंग और लिंगती होते हुए हम दोपहर लगभग एक बजे हमारी बाइक्स को मुख्य सड़क से उतार कर कच्चे रास्ते से होते हुए बिलकुल स्पिति नदी के किनारे पहुँच गए l इस जगह पर आकर मन प्रसन्न हो गया l इतनी देर तक दूर से दिखने वाली स्पिति नदी को हम अपने हाथों से महसूस कर सकते थे l इस जगह पर चारों ओर पहाड़ों से घिरी स्पिति नदी बिलकुल मद्धम मद्धम बह रही थी और दूर पहाड़ों के शिखर पर चांदी सी चमकती बर्फ अलग ही नज़ारा पेश कर रही थी l कुछ ही देर में रजत, राजेश और अश्विनी भी हमारे साथ थे और एक बार फिर फ़ोटोज़ लेने का दौर चल पड़ा l

इस जगह पर एक बड़ी ही रोचक और हास्यास्पद स्तिथि पैदा हुई l हुआ यूँ के हमारे पहुँचने के बाद एक बाइक पर दो बन्दे भी वहीँ हमारे पास नदी किनारे पहुँचे l दोनों पूरी तरह से राइडिंग गियर्स में थे जैसे हेलमेट, जैकेट, नी-गार्ड इत्यादि l उनके वहाँ पहुँचने पर रजत ने एक बन्दे से आज्ञा ले कर उनकी फ़ोटोज़ लेने चालू कर दिए l और फिर जैसा की दोस्त आपस में करते है,  रजत ने दुसरे बन्दे को छुना चालू कर दिया और उसकी पीठ पर भी एक-दो बार अपने हाथ से थपकी मार दी l ये देख कर हम सब सकपका गए क्योंकि वो दूसरा बंदा एक लड़की थी और वो दोनों पति-पत्नी थे जो की साथ ही घूम रहे थे l असल में पूरे राइडिंग गियर्स होने ने कारण रजत पहचान ही नहीं पाया की वो लड़की है l जब हमने उसे ये बात बताई तब वो भी काफी सकपका गया और फिर उसने उनके पास जा कर सॉरी बोला l वो दोनों पति-पत्नी भी काफी अच्छे थे और इस ग़लतफहमी पर वो भी काफी हँसे l

काफी देर तक स्पिति नदी के किनारे रुकने के बाद हम सब फिर काज़ा के लिए निकल पड़े और दोपहर के लगभग सवा-दो बजे हम अपने होटल साक्या पहुँचे l होटल काफी अच्छा और साफ़ सुथरा था और यहाँ रजत, राजेश, अश्विनी को फर्स्ट फ्लोर पर और मुझे और विक्रांत को ग्राउंड फ्लोर पर कमरा मिल गया l होटल के बगीचे में खिली खिली धुप में हम सबने चाय-काफी का आनंद लिया और फिर मैं मेरी बाइक का टायर सही करवाने निकल पड़ा l नया टायर तो शिमला में ही मिल सकता था इसीलिए पता करके काज़ा में एक टायर वाले के पास गया और उसको अपनी बाइक का अगला टायर दिखवाया l उसने ये सुझाव दिया की टायर को पूरा खोल कर फुले वाले भाग के अन्दर से एक पैच लगाना होगा l चूँकि मेरे पास कोई दूसरा विकल्प तो था नहीं इसीलिए मैंने उसके सुझाव के अनुसार ही टायर सही करवाया, इस प्रक्रिया में लगभग डेढ़ घंटा लग गया l होटल आते वक़्त मैंने मेरी बाइक में पेट्रोल भी फुल करवा लिया क्योंकि मुझे मालुम था की अब पेट्रोल रेकोंग-पेओ में ही मिलेगा l

शाम को हम सब काज़ा के बाज़ार में घुमने गए l मैं मन में सोच रहा था कि काज़ा का बाज़ार बहुत बड़ा होगा लेकिन मेरी आकांक्षाओं के विपरीत ये बहुत ज्यादा बड़ा बाज़ार नहीं था, मैं शायद इसकी लेह के बाज़ार से तुलना कर रहा था l हालाँकि 12,500 फीट की ऊँचाई के हिसाब से ये काफी अच्छा बाज़ार है और यहाँ जरुरत का लगभग हर सामान मिल जाता है l हम सबने अपने घर के लोगों के लिए कुछ चीजें खरीदी, कुछ खाया-पिया और कुछ देर घुमने के बाद शाम सात बजे के आस पास अपने होटल पहुँच गए l

शाम की आज की महफ़िल का विषय था ‘मोहब्बत और बेवफाई’, एक ऐसा भावुक, संजीदा और उलझा हुआ विषय जिसने की दुनिया में लगभग हर किसी व्यक्ति के दिल को छुआ हो तो यक़ीनन हर किसी का इसको देखने का अपना अपना तरीका होगा और सबके अनुभव भी भिन्न भिन्न होंगे l पुरानी यादें तरों-ताज़ा हुई, भावुकता की रसधारा बही, बहस बाज़ी हुई, तर्क-वितर्क भी चलें पर जैसा की हमेशा होता है अंत में परिणाम कुछ नहीं निकला l दूसरों के अनुभवों और तर्क-वितर्कों से भले ही हम पूरी तरह से संतुष्ट ना हों पर इससे हम जीवन के दुसरे आयाम को भी देख पाते है और साथ में हमारा बौद्धिक विकास भी होता है l

रात साढ़े नौ बजे हम सबने रात का खाना खाया l साक्या होटल का खाना काफी अच्छा था और कई दिनों के बाद हमने अच्छी रोटियाँ खाई l खाने के बाद हम सब कुछ देर बाहर टहले और रजत ने यहाँ अपनी आकाश गंगा मिल्की-वे को अपने कैमरे में कैद करने की योजना बनायीं l अगले दिन भी हम यहीं काज़ा में रुकने वाले थे इसीलिए रजत ने ये योजना अगले दिन के लिए रख ली l कुछ देर टहलने के बाद हम सब अपने अपने कमरे में जा कर सो गए l

ताबो

नई मोनेस्ट्री

मोनेस्ट्री में स्तिथ स्तूप

मोनेस्ट्री के पास का दृश्य

ताबो का सरकारी स्कुल

ताबो के खेत

काज़ा की ओर

रुखा सा भूभाग
बर्फ के पहाड़ों में जाती सड़क



काज़ा की ओर

स्पिति नदी काज़ा तक साथ ही बहती है

बादलों ने पहाड़ का मुहँ ढक लिया

काज़ा की ओर

धनकर जाने का प्रवेश द्वार

धनकर की ओर जाती सड़क

स्पिति नदी

धनकर की चढ़ाई

धनकर की ओर

खुबसूरत दृश्य

धनकर का प्रथम दर्शन

बुद्धिश झंडे

धनकर मोनेस्ट्री प्रवेश द्वार

धनकर गाँव

धनकर मोनेस्ट्री के अन्दर का दृश्य

धनकर मोनेस्ट्री

ये क्या हैं ?

धनकर मोनेस्ट्री

मोनेस्ट्री से दिखने वाले लाज़वाब दृश्य

मोनेस्ट्री के सामने का दृश्य

मोनेस्ट्री के ऊपर जाती सीढियां

मोनेस्ट्री की छत से दिखने वाले खुबसूरत दृश्य

मोनेस्ट्री की छत से दिखने वाले खुबसूरत दृश्य

काज़ा की ओर

काज़ा की ओर

स्पिति नदी का विशाल रूप

स्पिति नदी

स्पिति नदी

स्पिति नदी

विक्रांत और मेरी सवारी

काज़ा की ओर

काज़ा

हमारा होटल साक्या एडोबी

मेरी बाइक का टायर

काज़ा के बाज़ार की ओर

काज़ा

काज़ा

हमारे होटल का रेस्तौरेंट

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